सोनौली नगर पंचायत: जर्जर बिजली पोलों के सहारे टिकी है 'खतरनाक' रोशनी
सोनौली, महाराजगंज। भारत-नेपाल सीमा पर स्थित अंतरराष्ट्रीय महत्व का नगर पंचायत सोनौली आज एक ऐसी समस्या से जूझ रहा है, जो किसी भी वक्त एक बड़ी त्रासदी में बदल सकती है। सड़कों के किनारे खड़े जर्जर, जंग खाए और तिरछे हो चुके बिजली के पोल अपनी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रहे हैं।
विडंबना यह है कि जिस नगर को 'गेटवे ऑफ इंडिया' के रूप में चमकना चाहिए, वहां के नागरिक सिर पर मौत का साया लेकर चलने को मजबूर हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है: क्या नगर पंचायत प्रशासन और विद्युत विभाग की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है?
खतरे का नंगा नाच: जर्जर पोलों की हकीकत
सोनौली के मुख्य बाजारों से लेकर रिहायशी गलियों तक, स्थिति भयावह है। कई पोल आधार से पूरी तरह गल चुके हैं और केवल तारों के खिंचाव के दम पर टिके हैं।
- सड़कों पर लटकती मौत: तिरछे पोलों की वजह से हाई-वोल्टेज तार सड़कों के बेहद करीब आ गए हैं।
- हल्की बारिश, बड़ा डर: मानसून या सामान्य बारिश में इन पोलों में करंट उतरने की घटनाएं आम हैं, जिससे राहगीर और मवेशी हमेशा खतरे में रहते हैं।
- हादसे का इंतजार: क्या प्रशासन को किसी बड़ी जनहानि का इंतजार है, जिसके बाद कागजी खानापूर्ति और मुआवजे का खेल शुरू किया जा सके?
नैतिक जिम्मेदारी और जवाबदेही का अभाव
नगर पंचायत प्रशासन का काम केवल साफ-सफाई या सड़कों तक सीमित नहीं है। नागरिक सुरक्षा उसकी प्राथमिकता होनी चाहिए। जब टैक्स वसूली की बारी आती है, तो प्रशासन मुस्तैद रहता है, लेकिन जब जर्जर बुनियादी ढांचे को बदलने की बात आती है, तो गेंद 'विद्युत विभाग' के पाले में डाल दी जाती है।
प्रशासन से कुछ तीखे सवाल:
- समन्वय की कमी क्यों? नगर पंचायत और बिजली विभाग के बीच तालमेल क्यों नहीं बैठता कि इन पोलों को प्राथमिकता पर बदला जाए?
- वीआईपी मूवमेंट बनाम आम जनता: जब कोई बड़ा नेता या अधिकारी आता है, तो व्यवस्थाएं रातों-रात सुधर जाती हैं। आम जनता की जान इतनी सस्ती क्यों है?
- स्मार्टनेस का दिखावा: रंगीन लाइटों और गेटों पर लाखों खर्च करने वाले प्रशासन को इन जर्जर पोलों का दर्द क्यों नहीं दिखता?
आंसू बहाते पोल और सुस्त तंत्र
यह कहना गलत नहीं होगा कि ये पोल अपनी दुर्दशा पर 'आंसू बहा रहे' हैं। यह आंसू उस तंत्र की विफलता पर हैं जो अंतरराष्ट्रीय सीमा पर होने के बावजूद अपनी बुनियादी सुविधाओं को दुरुस्त नहीं कर पाया। पर्यटकों के लिए यह दृश्य भारत की एक पिछड़ी हुई तस्वीर पेश करता है।
"शिकायतें फाइलों में दफन हैं और पोल जमीन पर गिरने को बेताब। यह उदासीनता केवल लापरवाही नहीं, बल्कि अपराध की श्रेणी में आती है।"
जागने का वक्त आ गया है
सोनौली की जनता अब केवल आश्वासनों से संतुष्ट होने वाली नहीं है। नगर पंचायत प्रशासन को अपनी नैतिक जिम्मेदारी समझते हुए विद्युत विभाग पर दबाव बनाना चाहिए और युद्ध स्तर पर इन जर्जर पोलों को बदलवाना चाहिए। इससे पहले कि कोई पोल किसी मासूम की जान ले ले, प्रशासन को अपनी गहरी नींद से जागना होगा।



















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